अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 11

अब यह क्रमिक महत्व बिलकुल उल्टा हो गया था । इस युग में उसका क्रम शस्त्र

1. पार्थिव द्रव्य-सोनर, पाँदी आंद्रेक्ष

हैमवतन्मथ (स्पिरलय की ओर उत्तरी व्यापार मागं) दक्षिण-पथ (दक्षिण भारत कै व्यापार मागं) से अच्छा है क्योंकि उसके द्वारा ही हाथी, घोड्रे, गंध द्रव्य, हाथीदाँत, क्या, चाँदी, सोना आदि बहुमूल्य एवं कंबल, ऊन, वन्य पशुओं की खाते तथा देनिक क्या की वस्तुएँ प्राप्त होती हैं । परंतु कौटिल्य कं विचार से इस युग की वृष्टि मै हेमवत-यथ से दक्षिण-पथ ही अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि वहाँ ऊन, योड़े, यन्य पशुचर्मं आदि कुछेक चीजों को छोडकर शंख, हीरा, मणियों, मोती, सोना आदि बहुमूल्य तथा अन्य व्यापारिक वस्तुएँ भी उपलब्ध होती हैँ । दक्षिणापथ में भी वह मार्ग सबसे श्रेष्ठ है दो खानों में से गुज़रता हे, जिस पर आनान्जाना बहुत होता है और अभीष्ट द्रव्य प्राप्त करने में परिश्रम भी कम पडता है ।1 इसके अतिरिक्त भारत के जलमार्ग भी बड़े महत्व के थे । पूर्व में पूवति तट, ब्रह्मदे’श, सुवर्ण भूमि (मलाया, थाइलैंड, इंडोचाइना’), पूर्वीय द्वीपसमूह तथा चीन के साथ भारत का व्यापार जहाजों द्वारा चला करता था । इसी प्रकार पश्चिम में अपरांत तट, पर्शिया, अरब, अफ्रीका (मिस्र) एशियामाइनर, मिस्र तथा सीरिया का समस्त प्रदेश एवं ग्रीस भारत कॅ ही समुद्गी व्यापार का क्षेत्र था । यह सब पीछे लिखा जा चुका डै । इतने विशाल क्षेत्र से प्राप्त होनेवाले द्रव्यों का फिसर्नकेस भाँति आयुर्वेदिक चिकित्सा में समावेश हुआ यह हम इन्हीं व्यापार मार्गों के अध्ययन द्वारा भली प्रकार जान सकते हैँ । कौटिल्य कं लेखानुसार हम स्पष्ट ही जानते हैं कि इस युग में प्रधान व्यापार खनिज द्रव्यों का ही था । उसने दक्षिण भारत को इसी आधार पर महत्त्व दिया है कि वहाँ खानें अधिक थीं, और धातबीय द्रव्य प्रचुर मात्रा में मिलते ये । जिस प्रकार उत्तराखंड के हिमालय में जड्रीड्डेबूटियॉ प्रचुरता से प्राप्त होती थीं उसी प्रकार दक्षिण भारत कै पर्वतों से धातु और उपधातु विशेष मिलते थे । खनिज द्रव्यों कै व्यवसाय कै लिये उस युग में एक स्वतन्त्र राजकीय विभाग काम करता था । इसके अधिकारी क्रो “आकराध्यक्ष’ कहा जाता था । मैंगास्थनीज ने इस भारतीय बिभाग के कार्य का विस्तृत उल्लेख किया है 3 चाणक्य ने जो वर्णन लिखा है उससे स्पष्ट हैं कि खोना, पॉटी, ताँबा, सीसा, लोहा, टिन, वेक्रांत, पीतल, वृत्त (भर्त) कांसा, हरताल, किं, पारद ओर ठीरेजवाहिरात आदि सरि ही द्रव्य भारतवर्ष की खानों से ही निकलते प्र र कौटिल्य ने दुक्तिविभाग कै अधिकारी “आकराध्यक्ष’ की येस्थ्यता में तीन बाते अत्यंत लिखी ।

1, तांबा आदि धातुओं का पूरा परिज्ञान होना चाहिए ।

2. जंगम द्रव्य-घ्रर्म, रुधिर आदि,

3. स्थावर द्रव्य-जडी-मूटी आदि,

इस क्रमिक महत्व को ध्यान में रखकर हीं हमेँ यहाँ विचार करना ठोगा । आज़ की भौगोलिक स्पिति से प्राचीन इतिहास को अध्ययन करना मूल है । इसलिए जिस युग कै संबंध में हमें बिचार करना है, उसी युग की भौगोलिक स्थिति भी हमारे ध्यान ने’ होनी चाहिए । आदिकाल में भारत (आर्यावर्त) का विस्तार पूर्व और पश्चिम दिशग्लो की और अधिक था । पूर्व में प्रशांत महासागर, पश्चिम में भूमध्य सागर, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में विंध्याचल । यही आर्यावर्त की सीमा थी ।1 विंध्याचल कँ दक्षिण का समस्त भारत आर्यों का तो था,2 परंतु व्यवसाय और वैज्ञानिक वृष्टि से यह आर्यावर्त के लिए बिलकुल उपयोगी न था । राजनैतिक विद्वेष वो कारण आर्यावर्त कं निवासी दक्षिणापथ का कोई उपयोग न कर सकते ये । इसी कारण आदिकालीन आयुर्वेद में हिमालय और विंध्याचल के बीच प्रशांत से भूमध्य सागर तक उत्पन्न होनेवाले द्रव्यों में ही विशेष रुप से आयुर्वेद के विज्ञान का भरण-पोषण हुआ था । यह अवश्य है कि मिस्र और ग्रीस की थोडी-बहुत वस्तुएँ भारत क्रो मिलती थीं । परंतु वे प्रधान आयुर्वेदिक-उपादान नहीं कहे जा सकते । इसीलिए आत्रेय और धन्तंतरि के उपदेशों में हम देखते हैँ कि औषधियों की परामूमि हिमालय शेल ही बना हुआ था । इस प्रकार यह स्पष्ट हे कि आदिकाल में भारत का उत्तराखंड ही हमारे आयुर्वेद की वैज्ञानिक प्रयोगशाला था । हाथीदृ घोड़े, चपड़ा, हाथीदाँत, ऊन आदि व्यावहाश्कि वस्तुओं के अतिरिक्त गंध द्रव्य ओषधियाँ तथा सोनावाँदीं आदि आवश्यक द्रव्य प्रचुर मात्रा में इस भूभाग मेँ उत्पन्न होते थे । परंतु इस उत्तरकालीन युग में भारतवर्ष की भौगोलिक स्थिति बहुत कुछ बदल गई थी । पश्चिम की ओंर का वहुत सा भाग आर्यों के हाथ से निकल गया था । एशिया माइनर से लेकर पर्शिया कै मध्य पाग तक का प्रदेश यवनों (यूनानियों) ने अपने अधिकार में कर लिया था । स्वर्ग और अलकापुरी के प्रदेश कथा शेष ही रह गए ये । परंतु दक्षिण में अब विंध्याचल तक ही नहीं वल्कि माइसोर तक पाटलिपुत्र का ही अखंड राज्य था । भारत की समुद्री शक्ति मी वहुत समृद्ध हो गई यी । इसलिए दक्षिण भारत तथा उससे क्या समस्त द्वीपों की पैदावार भी हमारे आयुर्वेदिक द्रव्य कोष में सम्मिलित हो चुकी थी । कौटिल्य ने आर्थिक और राजनेतिक उपयोगिता फी तुष्टि से प्राचीन उत्तराखंड कौ तुलना उत्तरकालीन दक्षिणापथ से की है ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *