अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 12

कच्ची धातु को पकाकर उससे पारा निकालना आना चाहिए । मणियों कै रंगरूप की पहचान होनी चाहिए ।

यदि वह यह बातें स्वयं न जानता हो तो वेसे विशेषज्ञ को अपने साथ रखे । शा में अंतर्निहित खानों को कच्ची धातु के भार, रंग; उग्र गंध तथा स्वाद के द्वारा पहवल्ला हो उस विभाग के लिए साधारण ज्ञान की बात थी । पहाडों की शिलाओं से धातुओं क्रो प्राप्त करने कं संबंध में भी कौटिल्य ने मार्क की बातें लिखी हैँ । उसने लिखा है कि पर्वतों कं गडूदों, गुफाओं, तराइयॉ तथा दरारों में नाना प्रकार के द्रव बहा करते हैं । यदि इस द्रव का रंग जामुन, आम, ताड्रफ्ला, पकी हुई हल्दी, हडताल, शहद, सिंगरफ कमल, तोता या मोरपंख कं समान हो या काई के समान चिल्लाहट हो, पारदर्शक और भारी हो तो समझना चाहिए कि यह द्रव सोने को कच्ची घातु से मिश्रित है । यदि द्रव पानी में डालते ही संपूर्ण सतह को व्याप्त कर ले, सब गर्द और मैल को इकटूठा कर ले तो उसे सी फीसदी ताम्र और चाँदी से मिश्रित समझना चाहिए । जो द्रव देखने में इसी प्रकार का हो, परन्तु गन्थ स्वाद में उग्र हो तो उसे शिलाजतु से मिश्रित समझना चाहिए । इसी प्रकार अन्य भी धातु और उपधातुओं कीं पहचान कौटिल्य ने विस्तार से लिखी है । इस प्रकार हम देखते हैँ कि मध्यकाल से बिशेष विकास की ओर चलते-चलते धातबीय विज्ञान इस युग तक अत्यंत उन्नत अवस्था को पहुँच गया था । धातु उपधातु, धातुमिश्नण, धातुओं के रासायनिक परिवर्तन, धातुकिटूट क्या उनके गुरुत्व, लघुत्व और अवांतर भेदों कें संबंध में यह युग संसार का आदर्श बन गया था 3 केवल इतना ही नहीं, खान से निकली हुई फ्लो धातु को शुद्ध धातु कै रुप में परिवर्तित करने के लिए अनेक सरल और सस्ते उपाय उस युग में साधारणन्सी बातें वीं र चाणक्य ने लिखा है किं कच्ची धातु को मूत्र और क्षार मेँ भावना देकर राजवृक्ष (अमलतास), वट, पीलु तथा गीपित्त आदि कै साथ तपाना चाहिए, साथ ही भैंस, गधा और हाथी कै पेशाब तथा लीद की भी भावना दी जाए । इस प्रकार भावना देकर उत्ताप देने से शुद्ध धातु क्ली धातु से पृथकृ हो जाती है । यही धातु का सत्वपातन है ।

यह स्का शुद्ध धातु षटुत कठोर निकलती है. इसे मृदु मनाने कै लिए सार और स्नेह (घृत, मसा आदि) द्रव्यों में बुझाया जाए । सारे दी घातु एक सिद्धांत से हुत और मृदु नहीं होते, उसके इस विभेद क्रो ध्यान में रखकर विमिन धातुओं के लिए मिनश्चि कारखाने राजप्रवंध से धता काते ये धातुओं कै अतिरिक्त मुक्ता और मणियों कै उपयोग का भी इस युग में वहुत णयुर्च रहा । साधारण मुक्ताओं के दस मेद प्रचलित थे ।

1. तास्फीकि-ताम्रपर्णी या लंका देश में प्राप्त होनेवाले मोती ।

2. झइयकवाटक-षांइयदेश (दक्षिण भारत के निचले तट प्रदेश) में समुद्र से प्राप्त ती ।

3. पाशिक्य-पाश नामक नदी में प्राप्य होती ।

4. कौलेय-सिंहत्त द्वीप में मयूर नामक ग्राम के समीप ‘कुल‘ नाम क्री नदी बहती थी, वहॉ से प्राप्य मोती ।

5. चीर्णय-कैरल देश में मुरचि नामी गाँव कं पास बहनेवाली “चूर्णा‘ नदी में प्राप्त होनेवाले मोती ।

6. माहैँद्र-महेद्ग पर्वत कं (मद्रास) तट से प्राप्य मोती । 7. कर्दमिक-पारसीक या पर्शिया देश में कर्दम नामी नदी में प्राप्य मोती ।

8. खोतसोय-बर्बर नामक समुद्र में गिरनेवाली स्रोतसी नदीं में प्राप्य मोती ।

9. हादीय-बर्बर नामक समुद्र कै एक गहरे ‘हद’ नामक पार्श्व में प्राप्य मोती ।

10. डैपवत-हिमालय पर्वत की मानसरोवर आदि झीलों से प्राप्य मोती । मोतियों के यह सारे ही प्रकार ओषत्युपयोगी थे, और व्यवहार में आते थे ।

संभवत: ठवें और 9वें प्रमेद क्रो एक मानकर वाम्भट ने भी मोतियों को नौजातियों में बाँटा है । मोतियों के अतिरिक्त मणियों का संक्षिप्त परिचय और देख लीजिए । मुख्यत: णीप्यों के प्राप्त होने कै तीन स्थान थे।. कीट मणियॉ-जो कूट पर्बत (विंध्याद्रि) से प्राप्य थीं । मालेयक मणियॉ-मालेय से प्राप्य यी ।पार समुद्रक-समुद्र के पार या भीतर से प्राप्य थीं । ‘मणि’ सामान्य शब्द है । पैकान्त, हीरक आदि उसके अनेक मेद ओर प्रयेद है र शामट ने मुख्य 14 भेद लिखे हैं ।’३ परंतु कौटिल्य ने 34 मेद तक लिखे हैं ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *