अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 13

मणि भेद भारत कै निम्म प्रदेशों से प्राप्त ढोते ये”

1. सभाराष्ट्रक हीरक-विदर्भ (बरार) देश के अंतर्गत सथाराष्ट्र देश से प्राण र

2. काश्मीर रांष्ट्रक-काश्मीर देश से प्राप्य ।

3. मध्यम राजक-कोशल देश कै अंतर्गत “मध्यम राष्ट्र‘ या मध्यदेश से प्राप्य ;

4. श्री कटनक-वेदोत्कट पर्वत से प्राप्य ।

3. मणिमंतक-मणिमंत पर्बत से प्राप्य ।

6. इंद्रवानक-कतिपां (उडीसा) देश से प्राप्य ।

इस प्रकार पार्थिव द्रव्यों कँ संबंध में यह युग बहुत वढा-चढा था र भारतीयों ने इस संबंध में जो वैज्ञानिक आविष्कार किए, उनमें विशेषता यह हे कि उनके साधन सस्ते और सुलभ थे । पालतू पशुओं के मल और मूत्र भी वे व्यर्थ नष्ट न होने देते थे । इस प्रकार पशुओं की उपयोगिता भी दूनी हो गई थी । हम इसी एक बात से यह अनुमान लगा सक्रत्ते हैँ कि पशुओं कं मूत्र का भी मूल्य होने के कारण, लोग पशुपालन में अधिक दृत्तवित्त अवश्य रहते होंगे । फ़लत८ घी और दूध के आधिक्य से जनसाधारण के स्वास्थ्य की अवस्था अधिक अच्छी होना स्वाभाविक ही था । अस्तु कौटिल्य ने विषों कै ‘ उपयोग के संबंध में भी बहुत कुछ प्रकाश डाला डै । जंगम, स्थावर और पार्थिव विषों के संबंध में1 भी पर्याप्त विवरण यहाँ दिया जा सकता है, ” परंतु विस्तार भय से हम उसे छोड देना ही उचित समझते हैँ ।

साधारणत’: बुद्ध भगवान् से ईसा तक कं 625 वर्ष के भारत को यदि हम भौतिक विज्ञान का एक कारखाना कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है । राजनैतिक और धार्मिक क्रस्तियों कै कारण वडी-बड्री उथलन्मुथल होने के बावजूद वैज्ञानिक और व्यापारिक दृष्टि से भारत का दृष्टिकोण एक-सा ही रहा । आयुर्वेद तो इस युग में एक दैनिक व्यवहार की वीज वना हुआ प्रतीत होता है । ॰ प्रतीत होता है कि लोग हरेक भौतिक पदार्थ को वेज्ञानिक दृष्टि से देखना ठी पसंद करते ये । व्यावहारिक जीवन में छोटी से छोटी चीज़ का हम किस प्रकार साथ उठा सकते हैं, यह भावना इस समय तक मी हमारे अंदर मोजूद यी । हमारा राजनेतिक और व्यापारिक क्षेत्र प्राया समस्त भूमंडल हीं यन गया था । इस कारण सारे हीं देश भारत कै आयुर्वेदिक विज्ञान से प्रभावित थे ।

उत्तरकालीन युग के निमतिग्रआँ मैं जिस प्रकार युद्ध का माम अवश्य लिया जाना बांठिए, उसी प्रकार कौटिल्य (चाणक्य) का माम भी नहीं भुलाया जा सकता । यों कहना चाहिए कि एक ने भारत के आध्यात्मिक स्वरूप का परिष्कार किया और दूसरे ये आधि भौतिक स्वल्प का । एक येरस्ना है तो दूसरा शरीर । ऐसो दशा में भारत कै व्यावहारिक जीवन को समझने के लिए हमें कौटिल्य को समझना होगा । धगवान् युद्ध ने जहाँ संसार की हरेक घटना क्रो आध्यात्मिक दृष्टि से देखा, वहाँ कौटिल्य ने विश्व कै प्रत्येक प्रसंग को राजनेतिक दृष्टि से देखना पसंद किया । कौटिल्य को यह डर लगा कि कहीं उसके बनाए सम्राट चंद्रगुप्त क्रो कोई बिष न खिला दे । इसलिए यह चंद्रगुप्त क्रो स्वयं ही थोड़ान्धोंड़ा बिष खिलाकर, बिष खाने का अध्यासी बनाने लगा । एक बार राजमहिषी मी प्रेप के कारण सम्राट के साथ भोजन करने बैठ गई । चंद्रगुप्त क्या जानता था कि में नित्य भोजन के साथ कितना बिष खाया करता हूँ । साम्राझी ने जेसे ही कुछ ग्रास खाए कि उसे विष का प्रभाव हो गया-वह क्षणक्वेंभर में मर गई । साम्राझी उस समय पूरे दिन की गर्भिणी थी । चाणक्य को जैसे ही इस घटना का पता लगा, उसने सुयोग्य देयों क्रो बुलाकर रानी का पेट फड़वाकर बच्चा निकलवा लिया । बच्चा जीवित निकल आया, परंतु विष की एक दूँदृ उसके सिर पर पहुँच गई थी । अत: चाणक्य ने शिशु का नाम बिदुसार रखा ।1 राजनीति में पगा हुआ जीवन इससे अधिक ओर क्या हैंग्गा? इसलिए तो ‘विशां’ नाम क्रो अलंकृत करने कै लिए जनता को चाणक्य और कौटिल्य जैसी उपाधियाँ ही सर्वोत्तम प्रतीत हुईं ।

कौटिल्य की दृष्टि में ‘उदूदेश्य की सफलता’ ही सांसारिक जीवन का आदर्श है । उस सफलता के लिए प्रयोग किए जानेवाले साधनों में ‘आदर्श’ और ‘अनादर्श’ की भावना कौटिल्य को अनावश्यक प्रतीत होती थी । धन्तंतरिं के युग में “विषकन्या’ की कल्पना हम सुश्रुत संहिता मेँ पढते ही थे,2 परंतु कौटिल्य ने उसे चरितार्थ करके दिखा दिया 3 कौटिल्य ने राक्षस को चंद्रगुप्त का अमात्य बनाने के लिए राक्षस के परम मित्र शकटार का लेख राक्षस के ही व्याघात के लिए प्रयोग का डाला । ठीक इसी प्रकार चाणक्य ने भिक्षुओं और वेधों को भी अपनी राजनीति का अस्त्र बनाया ।’३ चाणक्य ने देखा कि समाज भिक्षुओं और वैधों का संदेहरहित होकर आदर करता हे । यह दोनों स्वतंत्रापूर्वक वहॉ भी पहुंच सक्रत्ते हैं, जहाँ दूसरे की पहुंच असंभव हे । इसलिए चाणक्य ने वहुत से भिक्षुओं और वेधों को अपने गुप्तचरों के रूप में भारतवर्ष मे` नियुक्त किया और साथ ही विदेशों तक भी पहुंचा दिया । यमराज का चित्रपट पसारने माला निपुणक तथा मित्रभेदकारी जीवसिद्धि ऐसे ही क्षपणक ये ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *