अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 14

मुद्राराक्षस के कथानक से यह मी जान सकते हैं कि चाणक्य ने विरोधियों को बिष देने के लिए ‘तीक्ष्य रसदायी’ पैघों का मी उपयोग कितनी ही बार किया है । गुप्तचरों का साधारणता कार्य यहीँ, दान, सत्य. शीष, मृदुता ओंर साधुता लोगों में पढे । कुछेक सुधारवादियों ने अशोक से पूर्व इन्हीं पाखडपूर्ण मतभेदों कै निवारण के लिए बोद्ध भिक्षुओं की दो महासमाएं की थीं । तीसरी अशोक गै सगक्सि की परंतु वास्तविकता कै पोषक मी समाज ३ जीवित रह सकै, इससे अधिक उनको कोई फल शायद नहीं हुआ । तथापि अशोक ने अपने जीवन में काश्मीर. अफ्तानिस्तान तथा कलिंग की शस्त्र विजय करने के बाद अपनी सपूपं शक्ति धर्मक्ति में लगाई । इस धर्म-विजय का स्वरूप क्या था? यह कि ‘अशोक ने सर्वत्र मनुष्यों और पशुओं की चिकित्सा के लिए प्रबंध किया । जहाँ ओषधियाँ नहीं थी । यहाँ औषधियाँ लगवाई । मार्गों पर मनुष्यों और पशुओं कै आराम के लिए कृ। लगवाए और कुएं खुदवाए ।

दिव्यावदान की एक कथा से प्रतीत होता है कि अशोक की एक पत्नी महारानी स्मिरक्षिता’ सुयोग्य चिकित्सक यी ।’३ ‘एक बार सम्राट अशोक बहुत बीमार पडे । अनेक देयों से इलाज कराए परंतु सफ़लता न मिली । राजा को अपने जीवन की आशा न रही । अब राजा अपने उत्तराधिकारी की व्यवस्था काने लगे । जब रानी को यह ज्ञात दुआ तो उसे वडी चिंता हुईं । उसने राजा से कहा, आप चिंतित न हों, मैं आपकी चिकित्सा फ्लो । राजा सहमत हो गए । तिष्यरक्षिता ने चिकित्सा की ओर सम्राट नीरोग ही गए । सप्राट ने प्रसन्न होकर तिष्यरक्षिता को सात दिन के लिए सारे रस्थ्य की पूर्ण अधिकारिणी पना दिया ।’ इस सात दिन के शासन काल में तिष्यरक्षिता ने अपने सौतेले गेटे क्वाष्ठत कै साथ कैसा दुर्व्यवहार किया, इससे हमें कोई प्रयोजन नहीं, हमें तो यह देखना है कि अशोक की सदूथावना का यहाँ तक सुफल दुआ कि उस समय रिक्यो मी श्रेष्ठ बिफिब्सिकाएँ होने लगी थीं ।

चालीस शार्प तक ठाट-याट फे साथ अपने यशस्वी शासन को समाप्त करके अश्मक ने अपनी जीवन लोला समाप्त कर दी । अशोक ने जीवन-मर उधोग किया कि सोंप धास्तविक्रता को समझें । मिथ्या आडम्बरों कै पाखंड से मथकर सुखो रहे । जांबु लीगा मैं डाली गई स्वर्ण शिला की भाँति ये गीस्वपूर्ण उपदेश एक शा श्या प्रतिध्वनि कै साथ गुज्जर नीये पैठ गए । समाज का प्रवाह फिर उतो क्या यह क्या. क्या यह का श । श्या कै क्या क्या र्द. पू. से तेकर स्था र्द पूर्व तक अशोक के ज्यगक्तिरी श्या क्या तो रहे, पातु क्यों प कां जीवा। षा ओ। न म्पोति । यस्मिन यह दुआ कि मौर्य यश क्ष अगिन ससाद गुम्बा। को मसके सेनापति धधका नहीं रह सका । क्योकि तंत्र मंत्र का आडम्बर पेट भरने का ऐसा सरल व्यवसाय या जिसमेँ प्राचीन वेधो की भाँति औषधियों कै षोंटने पीसने और धूनी खर्च करने का झझट ही न था । जनता में जो लोग जिन प्राचीन महापुक्यों कै प्रति श्रद्धा रखते ये, उन महापुरुषों में उम्हें अनेक अलौकिक शक्तियाँ सुझाई गई और उन्हीं के नाम से ‘आँ स्याहा” जोडकर मंत्रों के पुरखे तेयार किए जाने लगे ।

साधारण जनता में राजनेतिक भय के कारण जब मंत्र और मंत्र का जादू फैलता जा रहा था; उस समय भी उच्व तथा शिक्षित वर्म में प्राचीन चिकित्सा प्रणाली का ही आदर था । चंद्रगुप्त के पुत्र बिचुसार कं राज्यकाल समाप्त हो जाने कै पश्चात 272 ईं. पू. से 232 ईं. पूर्व तक अशोक का शासनकाल आता है । इतिहासलों को बिदित है कि अशोक को जनता कै मनोभावों क्रो संगठित करने के लिए वडा उधोग करना पड़ा था । कोई ‘शिव‘ का मंत्र सिद्ध करता था तो कोई ‘बुद्ध‘ का । किसी को दुर्गा‘ का इष्ट था तो किसी क्रो “मजुश्री’ का । अशोक क्रोरांजनेतिक पवित्रता कै लिए यह सव पसंद न था । वह वेद्य को वैद्य देखना चाहता था और भिक्षु को भिक्षु । बैद्य की शक्ल में विषदायी और भिक्षु की शक्ल में मित्रभेदी को देखना उसे इष्ट न था । इसीलिए उसने समाज के विश्वासों को सुमार्ग पर लाने के लिए ‘धर्म महापात्र’ नामक एक अधिकारी अपने राज्य में नियुक्त किया, जिसका कार्य यही था कि वह जनता में फैलते हुए उपर्युक्त मिथ्या मंत्रजाल को नष्ट करने का उद्योग कस्ता रहे । अशोक ने अपने शिलालेखों यें लिखवाया था कि धर्म महामात्र पहले कभी नियुक्त नहीं किए गए; पर मैंने राज्याभिषेक के 13 वर्ष बाद इन धर्म महामात्रों क्रो नियुक्त किया ।1 डाँ. भंडारकर द्वारा डांल्लिखित ईसा से पूर्व चतुर्थ शताब्दी तक की दशा पर योद्धग्र’थ ‘निदूदेश’ का यह संदर्भ अच्छा प्रकाश डालता हे-‘आजीवकों का देवता आजीवक है, निगंथों का दैव्या निगंथ, जटिलों का जटिल है, परिव्वाज़कों का परिव्वाजक है, अवरुद्धों का अवरुद्धक है, जो लोग हस्ति; अश्व, गी, कुता, कौआ, वासुदेव, मलदेय, पुराणमद्गट, मणिभदृट. अणि, नाग सुश्मा; थक्ख, असुर; गंधव्य, महाराज; मण्ड. तूर्य, इंद्र, श्या, देय और दिशा की उपासना में लगे हैं उनके देवता क्रमश: हस्ति, अश्व, गो, कुत्ता; कोआ बासुदेव आदि है 3 अशोक इसी पाखइ को हटाना चाहता था । इसलिए उसने घोषित किग्रा-न्देफ्ताओं कै प्रियदान या पूजा की इतनी परवाह नहीं करते, जितनी इस बात को कि सव संप्रदायों फै सार (ताप) फी वृद्धि हो धर्म की उग्नति और धर्मं का आचरण इसी में है ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *