अर्वाचीन आयुर्वेद भाग 15

भारतीय दैवी देवताआँ कै माप कै साथ पल्लवित दुआ । चिकित्सा का मंत्रयान में पदार्पण और उसक अनुसंधान पवमान में कुछ लोग ऐसे भी ये जो प्राचीन चिकित्सा द्रव्यों का भी उपयोग करते थे और अंधभक्तों के लिए मंत्रन्तंत्रों का भी । उनक बेज्ञानिक परीक्षण इन द्रव्यों पर किसी न किसी रुप में चलते ही रहते ये । उत्तर भारत में मंत्रयान क आडम्बर के विर्रुद्ध अशोक के बाद पुष्यमित्र और महर्षि पतंजलि के आंदोलनों ने यद्यपि इसके अप्रतिहत विस्तार में बहुत-कुछ बाधाएँ डालीं अवश्य, परंतु फिर भी वह छोटी श्रेणी के लोगों व स्पियों में छिपे’-छिपे पोषण पाता ही रहा । प्रकट रूप में भारत कै उत्तरीय प्रदेश में न रहकर दक्षिण की ओर फलने-फूलने लगा । अब यह स्थिति अवश्य थो कि जनता वेध की गोली से मंत्र के जादू पर ज्यादा मुग्ध थी और यदि गोली ही खानी पड़े तो वह मी मंत्र से अभिमंत्रित ही होनी चाहिए थी । इसीलिए हम देखते हैं कि इस युग में लोहा शुद्ध करने के मंत्र, भस्म करने के मंत्र, रोगी को खिलाने आदि के न जाने कितने प्रकार के मंत्रों का आविष्कार हुआ । प्राचीन धातु चिकित्सा के ग्रंथों में आपकी इसी प्रकार के सैकडों मंत्र मिलेगे । सुश्रुत सोंहेता का प्रतिसंस्कार ईसा की प्रथम शताब्दी में नागार्जुन ने किया । इस_ प्रतिसंस्कार को बहुत विवेकपूर्वक तेयार करने पर मी मंत्रन्तंत्रों की संख्या कुछ बढ ही गई हैं ।1 आदिकाल में भी पंत्रीच्चारप कै साथ कार्य करने की परिपाटी थी, परंतु उस युग में वेदृमंत्रों का प्रयोग किया जाता था । मध्ययुग में यह ऐतिहासिक संस्मरणों की शक्ल में परिवर्तित दुआ 3 और इस क्या मैं उसका स्म गुरु और चेलों के मंत्र, साँप-बिब्लूकै मंत्र, ‘पूत-प्रेतों कै मंत्र, फ्लो तक कहे लिंग और योनि के मंत्र तक परिवर्तित हो गया 3 इस महान परिवर्त्तन का प्रधान श्रेय वीद्धों कै मंत्र यान को ठी है ।

आने पिछले श्या मैं विस्तार से इस युग कै धातु पिक्तिसा क्यों का उल्लेख किया ने मारकर मौर्य साम्राज्य का अंत कर दिया ।

पुष्यमित्र बीद्धृधर्म का द्वेषी था ओर ब्राह्मण धर्म का पवका अनुयायी । इस कारण छाने मोंछ भिक्षुओं के साथ सहानुभूति दिखाने कै स्यान पर उनका बहिष्कार शुरू का दिया । श्ती तरह पहरुभाष्यकार महर्षि पतंजलि का जन्म हुआ । महर्षि पतंजलि को अपना पुरोहित बनाकर पुष्यमित्र ने पिछले छ: सौ वर्षों से उपेक्षित यज्ञ और याग फिर से शुरु किए । यद्यपि महर्षि पतंजलि ने भी सामाजिक मिथ्या आडंबरों का निवारण किया, यस्तु महायान बौद्धधर्म की कठोर शिक्षाओं से बचकर जो लोग “सहज यान’1 पर क्तनै कै अध्यासी बन गए ये, वे महा कठिन वैदिक धर्म मार्ग पर क्योंकर चल सकते ये? सिद्ध चिक्खिक बने रहकर मंत्र के बल से पैसा पैदा करने वाले लोग भला औषधालय और संग्रहालय स्थापित करने का कष्ट क्यों उठाते? हम पूर्व में लिख चूकै हैं कि लोग भिक्षुओ और वेधों से भयभीत ही गए थे, इस कारण “बूम-फिरकर भिक्षुक का जीवन निर्वाह ढोना कठिन था । नए स्थान पर उसे कौन पहचाने र क्या मालूम वह संत है या सी. आई. डी. ? इसलिए भिक्षु लोग प्राय: एक ही स्यान पर आश्रम बनाकर रहने लगे । एक स्यान पर रहने से भिक्षु में जो दोष आने चाहिए वे आए । किसी को उनका मंत्र फला और किसी को न फला । बस, राग-द्वेष बढा । जो दशा भिक्षुओं को थी वह भिक्षुणियों की मी । वे सदैव इसी उद्योग में रहे कि स्थानीय जनता उन पर अंधश्रद्धा बनाए रहे और उनका स्वार्थ सिद्ध हो । लोग बेटर-बेटी, धन संपति और इसकी प्राप्ति के लिए नानाप्रकार की भेंट उन्हें देते थे । एक-एक सिद्ध र्के पास अमित धनराशि एकत्रित से गई । ये कहने मात्र को भिक्षु थे पर उनकी अवस्था विषय-वासनाओं में कैसे हुए मूल्यों से भी कहीं गिरी हुई थी । जनता द्वारा दी गई भेंट में द्रव्य, मदिरा और रन्नी तक शामिल यी । इस कारण विषयन्धोंग और व्यभिचार भी सहज यान का सुलभ क्या था । इसी युग में मिस्र, असीरिया और यूनान के यवन और प्लेच्छी ने भारतीयों कैघनिष्ठ संपर्क में रहकर इस प्रवृत्ति को पूरा प्रोत्साहन और सहयोग दिया क्योकिं इस” विधा कै आदिगुरु वे ही थे । इस काल से प्राय: हजारों वर्षों पूर्व भी हम उक्त पश्चिमीय” देशों मैं इस प्रवृति का प्रचुर-प्रचार देखते हैँ ।

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