टेलीविजन की क्रांतिकारी शोध

टेलीविजन की क्रांतिकारी शोध

अक्टूबर 2 1925 का ऐतिहासिक दिन । लंदन में जॉन लोगी बायर्ड नाम का एक स्कॉटिश संशोधक अपनी प्रयोगशाला में खुद की मेहनत से तैयार किए हुए मिकेनिकल साधन की मदद से एक छोटी सी गुड़िया के सिर पर प्रकाश किरणों की बौछार कर रहा था । अपने प्रयोग से थोड़ा संतोष हुआ तो उसमें दौड़कर बाजू के रूम पर जाकर जहां पहले से रखे हुए दूसरे एक साधन के कांच के पर्दे पर उस गुड़िया के जैसा रेखा चित्र चमकता हुआ देखा । उसी के साथउसकी की आंखें चमक उठी । कई दिनों तक एक ही संशोधन के पीछे मेहनत कर रहा था। आज उसकी मेहनत रंग लाई थी ।

दूसरे ही क्षण बाय रोड पर गली में पहुंचा और विलियम टायन्तन नाम के एक लड़के को पकड़ कर अपनी प्रयोगशाला में लाया । ऑफिया बॉय के रुप में उसको उसने नौकरी पर रख कर उस पर प्रयोग शुरू किया । थोड़े महीने बाद 1926 में बायर्ड ने इंग्लैंड की रॉयल इंस्टिट्यूट के सभ्यो को बिल्कुल अनोखा और अभूतपूर्व कहा जा सके ऐसा प्रयोग अपनी आंखों से देखने के लिए बुलाया । बायर्ड ने बहुत ही कम साधन और कुल कम आर्थिक सहयोग से सबसे पहले टेलीविजन कैमरा और रिसीवर सेट बनाया था । विलियम की तस्वीर को काँच के पर्दे पर लाकर दुनिया का सबसे पहला टेलीविजन ट्रांसमिशन पर दिखाया । लेकिन कांच के पर्दे पर जो दर्शय देखने को मिला वह दृश्य अस्पष्ट और बार-बार जलता बुझता था । इंसान का चेहरा कुछ अंतर पर कहीं और पर देखा जाए उस समय में कि नहीं जा सकती थी ।

जॉन लॉगी बायर्ड ने जो चमत्कार कर दिखाया उसके पीछे अनेक संशोधन को कड़ी मेहनत थी । बायर्ड नव प्रयोगशाला में विलियम धुंधली तस्वीर लाई उसकी नींव उस से पहले ही लगभग आधी सदी पहले ही डाली जा चुकी थी । अलेक्जेंडर ग्राहम बेल और दूसरे संशोधक टेलीफोन ढूंढने के प्रयास कर रहे थे । उसी समय कुछ संशोधक को विचार या चुका था कि कि एक दूसरे से रही दो व्यक्ति के बीच बातचीत हो सकती है तो उस साधन को थोड़ा और विकसित करके इंसान का जीवंत चेहरा भी रपेश करने वाला साधन बनाया जा सकता है । लेकिन उस समय इसका विचार करना जितना सरल था उतना ही उसे अमल में रखना कठिन था ।

सबसे पहले सन 1880 में अमरीकन विज्ञानी जी आर केरे ने बिजली का उपयोग करके किसी दर्शय को केमेरा मे अंकित करके उस दृश्य को दूर के कोई स्थान पर बताया जा सके ऐसा विचार पेश किया था । उसके बाद सन 1984 में पौल निपकोव नाम के जर्मन संशोधन प्रयोग किये । निपकोव डिस्क नाम की धातु की तख्ती भी तैयार की थी । यह शोध क्रांतिकारी पुरवार हुई थी । सन 1897 के समय जर्मनी भौतिकशास्त्री फर्डि नाण्ड ने कैथोड रे ट्यूब का आविष्कार किया । जो समय जाते टेलीविजन के आविष्कार में नींव का पत्थर साबित होने वाली थी ।

नियोकोव की डिस्क और फर्डिनेण्ड की कैथोड रे ट्यूब का इस्तेमाल करके संशोधक आगे का संशोधन कर रहे थे । सन 10906 में रशियन विज्ञानी प्रोफेसर बोरिस रोज़िंग ने निपकोव की डिस्क और कैथोड रे ट्यूब का इस्तेमाल करके प्रयोग किये । लेकिन उसे संशोधन में सफलता नहीं मिली ।

लेकिन उसे इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन के आविष्कार के लिए भगीरथ संशोधन में ज्यादा दिलचस्पी जगी। सन 1923 में व्लादिमीर जवोरिकीन नामनके रशियन संशोधक ने केम्पबेल के सिद्धांत के आधार पर पिक्चर ट्यूब विकसित की । यह साधन भी टेलीविजन की शोध के लिए क्रांतिकारी साबित होने वाला था ।

1926 में बायर्ड की प्रयोगशाला में पहली बार लाइव टेलीकास्ट जिनको देखने मिला उनको कल्पना तक नहीं थी कि वे दुनिया की एक क्रांतिकारी शोध के साक्षी बन रहे थे । सालों पहले एक स्थान से दूसरे स्थान पर संदेश भेजा जा सके यही बात असत्य लगती थी तो किसी अज्ञात कोने में बनती घटना को उसी समय नाम के साथ अपनी नजर के सामने देख सकते हैं यह बात तो लोगों को दो और दो पांच जैसी अशक्य लगती थी ।

बीसवीं सदी में मोशन पिक्चर्स और रेडियो की सेवा का विकास हो रहा था और उसी के पगले चलचित्र टेलीविजन किसी के घर में पहुंच जाए ऐसे दिन दूर नहीं थे। प्रथम प्रयोग के बाद 3 साल में तो बायर्ड ने लंदन में एक स्टूडियो शरु करके मनोरंजन कार्यक्रम का प्रसारण शुरू करने वाला था । लेकिन टेलीविजन किंशोध इतने प्राथमिक दौर में थी कि लोगों को शुरुआत में टीवी पर गीत गाता किसी का चेहरा दिखता , फिर डिस्प्ले काला हो जाता था और उसके बाद आवाज सुनाई देती थी । प्रयोगशाला में बैठे रॉयल इंस्टिट्यूट के सभ्यो को रतिभर कल्पना नहीं की जिससे उनको देख रहे थे उसका शुरूआत में भले मनोरंजन के माध्यम के रूप में उपयोग हो लेकिन समय आने पर एक दूसरे से हजारो किलोमीटर दूर के देशों को नजदीक लाने में यही साधन से सेतु का कार्य करेगा ।

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